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इंदौर में कुटुंब एवं वैवाहिक मामले

इंदौर में वैवाहिक मामलों की सुनवाई कुटुंब न्यायालय अधिनियम 1984 के अंतर्गत गठित कुटुंब न्यायालय करता है। विवाह-विच्छेद हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13ख के अंतर्गत आपसी सहमति से लिया जा सकता है, जिसमें दो प्रस्तावों के बीच छह माह का अंतराल आवश्यक है, अथवा धारा 13 के अंतर्गत विवादित रूप में।

संदर्भित अधिनियम

  • हिंदू विवाह अधिनियम 1955, धारा 9, 13, 13ख, 24 एवं 25
  • कुटुंब न्यायालय अधिनियम 1984
  • घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005
  • संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम 1890
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023, धारा 144

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इंदौर में आपसी सहमति से विवाह-विच्छेद में कितना समय लगता है?
अधिनियम में प्रथम प्रस्ताव, छह माह का अंतराल, और अठारह माह के भीतर द्वितीय प्रस्ताव की व्यवस्था है। व्यवहार में, जहाँ समझौता पूर्ण हो और दोनों पक्षकार उपस्थित हों, मामला द्वितीय प्रस्ताव के शीघ्र बाद समाप्त हो सकता है। उच्चतम न्यायालय ने उपयुक्त मामलों में छह माह की अवधि अधित्यक्त करने की अनुमति दी है।
क्या विवाह-विच्छेद का मामला चलते हुए भरण-पोषण माँगा जा सकता है?
हाँ। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 कार्यवाही के लंबित रहते भरण-पोषण तथा कार्यवाही के व्यय की व्यवस्था करती है, और यह किसी भी पति-पत्नी को उपलब्ध है। मजिस्ट्रेट के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144, पूर्व में दं.प्र.सं. की धारा 125, के अंतर्गत अलग आवेदन भी चल सकता है।
न्यायालय बालक की अभिरक्षा का निर्णय कैसे करता है?
बालक का कल्याण सर्वोपरि विचार है और वह माता-पिता के दावों पर भारी पड़ता है। न्यायालय बालक की आयु और इच्छा, प्रत्येक अभिभावक की देखभाल की क्षमता, वातावरण की स्थिरता, तथा बालक की शिक्षा और वर्तमान दिनचर्या पर विचार करता है। अभिरक्षा के आदेश अंतिम नहीं होते और परिस्थितियाँ बदलने पर परिवर्तित किए जा सकते हैं।
क्या घरेलू हिंसा अधिनियम का प्रकरण आपराधिक प्रकरण है?
कार्यवाही प्रकृति में सिविल है, यद्यपि इसे मजिस्ट्रेट सुनता है और कुछ अंशों में आपराधिक प्रक्रिया का पालन होता है। उपलब्ध अनुतोष संरक्षण, निवास, आर्थिक अनुतोष, अभिरक्षा और प्रतिकर हैं। अधिनियम के अंतर्गत पारित संरक्षण आदेश का उल्लंघन धारा 31 के अंतर्गत पृथक अपराध है।
क्या पत्नी को वैवाहिक गृह में रहने का अधिकार है?
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 की धारा 17 के अंतर्गत घरेलू संबंध में रहने वाली प्रत्येक महिला को साझी गृहस्थी में निवास का अधिकार है, चाहे उसका उसमें कोई अधिकार, स्वत्व या हितलाभ हो या न हो। धारा 19 के अंतर्गत निवास आदेश बेदखली रोक सकता है या वैकल्पिक आवास का निर्देश दे सकता है।

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अंतिम अद्यतन: 2026-09-26

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