इंदौर सत्र न्यायालय में आपराधिक बचाव
इंदौर में आपराधिक मामलों की सुनवाई अपराध के अनुसार न्यायिक मजिस्ट्रेट, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और सत्र न्यायाधीश करते हैं। 1 जुलाई 2024 से नए प्रकरण भारतीय न्याय संहिता 2023 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के अंतर्गत चलते हैं, जबकि उससे पूर्व दर्ज प्रकरण भारतीय दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत ही चलते रहते हैं।
चैंबर इंदौर के न्यायालयों में आपराधिक पक्ष पर सत्र विचारण, आपराधिक परिवाद प्रकरण, जमानत आवेदन, तथा स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम 1985 और मोटर यान अधिनियम 1988 सहित विशेष अधिनियमों के मामलों में उपस्थित होता है।
आपराधिक विधि में परिवर्तन
1 जुलाई 2024 से तीन अधिनियमों ने पुरानी आपराधिक संहिताओं का स्थान लिया।
| 30 जून 2024 तक | 1 जुलाई 2024 से |
|---|---|
| भारतीय दंड संहिता 1860 | भारतीय न्याय संहिता 2023 |
| दंड प्रक्रिया संहिता 1973 | भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 |
| भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 | भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 |
यह परिवर्तन भूतलक्षी नहीं है। 1 जुलाई 2024 से पूर्व किया गया अपराध भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत ही विचारित होता है, और उस तिथि से पूर्व दर्ज प्रकरण दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत ही चलता है। व्यवहार में इंदौर के न्यायालयों में दोनों व्यवस्थाएँ साथ-साथ चल रही हैं और कुछ वर्षों तक चलती रहेंगी। इसलिए किसी भी आपराधिक मामले में सबसे पहले यह तय करना आवश्यक है कि कथित अपराध की तिथि और प्रकरण दर्ज होने की तिथि क्या है, क्योंकि उसी से तय होता है कि कौन सी संहिता, कौन सी धाराएँ और कौन सी प्रक्रिया लागू होगी।
कौन सा न्यायालय क्या सुनता है
- न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी। तीन वर्ष तक के कारावास से दंडनीय अपराध, तथा अधिकांश परिवाद प्रकरण।
- मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट। मजिस्ट्रेट की अधिकारिता के भीतर अधिक दंड वाले अपराध।
- सत्र न्यायाधीश और अपर सत्र न्यायाधीश। विशेष रूप से सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय अपराध, तथा मजिस्ट्रेट न्यायालयों से अपील। एनडीपीएस अधिनियम के मामले विशेष न्यायाधीश के समक्ष आते हैं।
आपराधिक प्रकरण के चरण
- एफआईआर या परिवाद। संज्ञेय अपराध की सूचना भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173 के अंतर्गत दर्ज होती है, जो पूर्व में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 थी। तीन से सात वर्ष तक दंडनीय कुछ अपराधों में धारा 173(3) दर्ज करने से पूर्व प्रारंभिक जाँच की अनुमति देती है।
- अन्वेषण और गिरफ्तारी। पुलिस द्वारा अन्वेषण, गिरफ्तारी, उपस्थिति की सूचना और अभिरक्षा संबंधी संरक्षाओं सहित।
- जमानत। इस पर अलग पृष्ठ है।
- आरोप-पत्र और संज्ञान। अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत होता है और न्यायालय संज्ञान लेता है।
- आरोप विरचन। वह चरण जहाँ सामग्री से अपराध प्रकट न होने पर उन्मोचन माँगा जा सकता है। यह महत्वपूर्ण चरण है और प्रायः इसे हल्के में लिया जाता है।
- अभियोजन साक्ष्य और प्रति-परीक्षण।
- अभियुक्त का कथन, बचाव साक्ष्य, तर्क और निर्णय।
- अपील या पुनरीक्षण।
निरस्तीकरण
जब आरोप से कोई अपराध प्रकट न होता हो, या कार्यवाही प्रक्रिया का दुरुपयोग हो, तब उपचार उच्च न्यायालय के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के अंतर्गत आवेदन है, जो पूर्व में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 थी, और जो उच्च न्यायालय की निहित शक्तियों का आह्वान करती है। यह शक्ति संहिता के अंतर्गत आदेशों को प्रभावी बनाने, न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने, तथा न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु है। इसका प्रयोग संयम से और स्वीकृत मानदंडों के भीतर किया जाता है।
एनडीपीएस के मामले
एनडीपीएस अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाहियाँ अलग व्यवस्था से संचालित होती हैं। संबंधित मात्रा, अल्प, मध्यवर्ती या वाणिज्यिक, दंड तय करती है और यह भी कि धारा 37 के जमानत संबंधी प्रतिबंध लागू होंगे या नहीं। अन्वेषण एजेंसी द्वारा धारा 42, 50, 52 और 55 का पालन, जो सूचना अभिलिखित करने, राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट के समक्ष तलाशी के अधिकार, तथा पदार्थ की जब्ती और सुरक्षित अभिरक्षा से संबंधित हैं, न्यायालयों द्वारा बारीकी से देखा जाता है। ये तर्क के नहीं, अभिलेख के विषय हैं, और अभिलेख की जाँच आरंभ में ही सावधानी से की जानी चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इंदौर में आपराधिक प्रकरण पर कौन सी विधि लागू होगी, आईपीसी या बीएनएस?
यह कथित अपराध की तिथि पर निर्भर करता है। 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद किया गया अपराध भारतीय न्याय संहिता 2023 के अंतर्गत तथा प्रक्रिया भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के अंतर्गत चलती है। उससे पूर्व किया गया अपराध भारतीय दंड संहिता 1860 और दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अंतर्गत ही चलता है। वर्तमान में इंदौर के न्यायालयों में दोनों व्यवस्थाएँ प्रयोग में हैं।
क्या एफआईआर निरस्त की जा सकती है?
एफआईआर उच्च न्यायालय द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528, पूर्व में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482, के अंतर्गत निहित शक्तियों के प्रयोग में निरस्त की जा सकती है, जब कोई अपराध प्रकट न होता हो, कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण हो, या न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग हो। इस शक्ति का प्रयोग संयम से होता है। इसके अतिरिक्त पुलिस अन्वेषण पूर्ण होने पर खात्मा प्रतिवेदन प्रस्तुत कर सकती है, जिसे मजिस्ट्रेट स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है।
आरोप विरचन के चरण पर क्या होता है?
न्यायालय आरोप-पत्र के साथ प्रस्तुत सामग्री की जाँच कर यह तय करता है कि कार्यवाही आगे बढ़ाने का पर्याप्त आधार है या नहीं। यदि नहीं है तो अभियुक्त उन्मोचित किया जाता है। यदि है तो आरोप विरचित होकर विचारण आगे बढ़ता है। यह अंतिम बिंदु है जहाँ पूर्ण विचारण के बिना मामला समाप्त हो सकता है।
क्या आपराधिक प्रकरण में हर पेशी पर उपस्थित होना आवश्यक है?
सामान्यतः अभियुक्त की उपस्थिति आवश्यक है, क्योंकि आपराधिक विचारण अभियुक्त की उपस्थिति में चलता है। पर्याप्त कारण होने पर संहिता के उपबंधों के अंतर्गत व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट माँगी जा सकती है, और परिवाद प्रकरणों में अभियुक्त के उपस्थित होकर जमानत देने के बाद सामान्य तिथियों हेतु यह प्रायः स्वीकार की जाती है। आरोप विरचन, अभियुक्त का कथन दर्ज होने और निर्णय के समय उपस्थिति आवश्यक है।
सत्र प्रकरण और परिवाद प्रकरण में क्या अंतर है?
सत्र प्रकरण वह है जो सत्र न्यायालय को सुपुर्द किया जाता है क्योंकि अपराध विशेष रूप से उसी न्यायालय द्वारा विचारणीय है, और यह पुलिस अन्वेषण तथा आरोप-पत्र से उत्पन्न होता है। परिवाद प्रकरण एफआईआर से नहीं, बल्कि सीधे मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत निजी परिवाद से आरंभ होता है, जिसमें न्यायालय परिवादी का कथन दर्ज कर और जाँच कर प्रक्रिया जारी करता है।
संदर्भित अधिनियम
- भारतीय न्याय संहिता 2023
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023
- स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम 1985
- मोटर यान अधिनियम 1988, धारा 185
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- इंदौर में आपराधिक प्रकरण पर कौन सी विधि लागू होगी, आईपीसी या बीएनएस?
- यह कथित अपराध की तिथि पर निर्भर करता है। 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद किया गया अपराध भारतीय न्याय संहिता 2023 के अंतर्गत तथा प्रक्रिया भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के अंतर्गत चलती है। उससे पूर्व किया गया अपराध भारतीय दंड संहिता 1860 और दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अंतर्गत ही चलता है। वर्तमान में इंदौर के न्यायालयों में दोनों व्यवस्थाएँ प्रयोग में हैं।
- क्या एफआईआर निरस्त की जा सकती है?
- एफआईआर उच्च न्यायालय द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528, पूर्व में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482, के अंतर्गत निहित शक्तियों के प्रयोग में निरस्त की जा सकती है, जब कोई अपराध प्रकट न होता हो, कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण हो, या न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग हो। इस शक्ति का प्रयोग संयम से होता है। इसके अतिरिक्त पुलिस अन्वेषण पूर्ण होने पर खात्मा प्रतिवेदन प्रस्तुत कर सकती है, जिसे मजिस्ट्रेट स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है।
- आरोप विरचन के चरण पर क्या होता है?
- न्यायालय आरोप-पत्र के साथ प्रस्तुत सामग्री की जाँच कर यह तय करता है कि कार्यवाही आगे बढ़ाने का पर्याप्त आधार है या नहीं। यदि नहीं है तो अभियुक्त उन्मोचित किया जाता है। यदि है तो आरोप विरचित होकर विचारण आगे बढ़ता है। यह अंतिम बिंदु है जहाँ पूर्ण विचारण के बिना मामला समाप्त हो सकता है।
- क्या आपराधिक प्रकरण में हर पेशी पर उपस्थित होना आवश्यक है?
- सामान्यतः अभियुक्त की उपस्थिति आवश्यक है, क्योंकि आपराधिक विचारण अभियुक्त की उपस्थिति में चलता है। पर्याप्त कारण होने पर संहिता के उपबंधों के अंतर्गत व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट माँगी जा सकती है, और परिवाद प्रकरणों में अभियुक्त के उपस्थित होकर जमानत देने के बाद सामान्य तिथियों हेतु यह प्रायः स्वीकार की जाती है। आरोप विरचन, अभियुक्त का कथन दर्ज होने और निर्णय के समय उपस्थिति आवश्यक है।
- सत्र प्रकरण और परिवाद प्रकरण में क्या अंतर है?
- सत्र प्रकरण वह है जो सत्र न्यायालय को सुपुर्द किया जाता है क्योंकि अपराध विशेष रूप से उसी न्यायालय द्वारा विचारणीय है, और यह पुलिस अन्वेषण तथा आरोप-पत्र से उत्पन्न होता है। परिवाद प्रकरण एफआईआर से नहीं, बल्कि सीधे मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत निजी परिवाद से आरंभ होता है, जिसमें न्यायालय परिवादी का कथन दर्ज कर और जाँच कर प्रक्रिया जारी करता है।
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अंतिम अद्यतन: 2026-09-20
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चैंबर का समय: सोमवार से शनिवार, सुबह 11:00 से शाम 7:00 बजे तक. रविवार अवकाश