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इंदौर सत्र न्यायालय में आपराधिक बचाव

इंदौर में आपराधिक मामलों की सुनवाई अपराध के अनुसार न्यायिक मजिस्ट्रेट, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और सत्र न्यायाधीश करते हैं। 1 जुलाई 2024 से नए प्रकरण भारतीय न्याय संहिता 2023 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के अंतर्गत चलते हैं, जबकि उससे पूर्व दर्ज प्रकरण भारतीय दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत ही चलते रहते हैं।

संदर्भित अधिनियम

  • भारतीय न्याय संहिता 2023
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023
  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023
  • स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम 1985
  • मोटर यान अधिनियम 1988, धारा 185

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इंदौर में आपराधिक प्रकरण पर कौन सी विधि लागू होगी, आईपीसी या बीएनएस?
यह कथित अपराध की तिथि पर निर्भर करता है। 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद किया गया अपराध भारतीय न्याय संहिता 2023 के अंतर्गत तथा प्रक्रिया भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के अंतर्गत चलती है। उससे पूर्व किया गया अपराध भारतीय दंड संहिता 1860 और दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अंतर्गत ही चलता है। वर्तमान में इंदौर के न्यायालयों में दोनों व्यवस्थाएँ प्रयोग में हैं।
क्या एफआईआर निरस्त की जा सकती है?
एफआईआर उच्च न्यायालय द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528, पूर्व में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482, के अंतर्गत निहित शक्तियों के प्रयोग में निरस्त की जा सकती है, जब कोई अपराध प्रकट न होता हो, कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण हो, या न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग हो। इस शक्ति का प्रयोग संयम से होता है। इसके अतिरिक्त पुलिस अन्वेषण पूर्ण होने पर खात्मा प्रतिवेदन प्रस्तुत कर सकती है, जिसे मजिस्ट्रेट स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है।
आरोप विरचन के चरण पर क्या होता है?
न्यायालय आरोप-पत्र के साथ प्रस्तुत सामग्री की जाँच कर यह तय करता है कि कार्यवाही आगे बढ़ाने का पर्याप्त आधार है या नहीं। यदि नहीं है तो अभियुक्त उन्मोचित किया जाता है। यदि है तो आरोप विरचित होकर विचारण आगे बढ़ता है। यह अंतिम बिंदु है जहाँ पूर्ण विचारण के बिना मामला समाप्त हो सकता है।
क्या आपराधिक प्रकरण में हर पेशी पर उपस्थित होना आवश्यक है?
सामान्यतः अभियुक्त की उपस्थिति आवश्यक है, क्योंकि आपराधिक विचारण अभियुक्त की उपस्थिति में चलता है। पर्याप्त कारण होने पर संहिता के उपबंधों के अंतर्गत व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट माँगी जा सकती है, और परिवाद प्रकरणों में अभियुक्त के उपस्थित होकर जमानत देने के बाद सामान्य तिथियों हेतु यह प्रायः स्वीकार की जाती है। आरोप विरचन, अभियुक्त का कथन दर्ज होने और निर्णय के समय उपस्थिति आवश्यक है।
सत्र प्रकरण और परिवाद प्रकरण में क्या अंतर है?
सत्र प्रकरण वह है जो सत्र न्यायालय को सुपुर्द किया जाता है क्योंकि अपराध विशेष रूप से उसी न्यायालय द्वारा विचारणीय है, और यह पुलिस अन्वेषण तथा आरोप-पत्र से उत्पन्न होता है। परिवाद प्रकरण एफआईआर से नहीं, बल्कि सीधे मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत निजी परिवाद से आरंभ होता है, जिसमें न्यायालय परिवादी का कथन दर्ज कर और जाँच कर प्रक्रिया जारी करता है।

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अंतिम अद्यतन: 2026-09-20

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