इंदौर में मध्यस्थता एवं संविदात्मक विवाद
जहाँ संविदा में मध्यस्थता खंड हो, वहाँ विवाद सिविल वाद के बजाय मध्यस्थता को निर्दिष्ट होता है। जिस न्यायालय में वाद लाया जाए उसे धारा 8 के अंतर्गत पक्षकारों को मध्यस्थता हेतु निर्दिष्ट करना होगा। अवार्ड को केवल धारा 34 के सीमित आधारों पर, प्राप्ति के तीन माह के भीतर चुनौती दी जा सकती है।
चैंबर मध्यस्थता कार्यवाहियों में तथा उनसे जुड़े न्यायालयीन आवेदनों में उपस्थित होता है, जिसमें अवसंरचना और संविदात्मक विवादों में सार्वजनिक उपक्रमों की ओर से पैरवी भी सम्मिलित है।
मध्यस्थता कब लागू होती है
धारा 7 के अंतर्गत मध्यस्थता करार लिखित होना चाहिए। जहाँ ऐसा करार हो और फिर भी कोई पक्षकार वाद प्रस्तुत करे, वहाँ दूसरा पक्षकार विवाद के सार पर अपना पहला कथन प्रस्तुत करने की तिथि से पूर्व धारा 8 के अंतर्गत आवेदन कर सकता है, और न्यायिक प्राधिकारी को तब पक्षकारों को मध्यस्थता हेतु निर्दिष्ट करना होता है।
उस चरण पर न्यायालय की जाँच सीमित है। वह करार के अस्तित्व को देखता है, विवाद के गुण-दोष को नहीं।
अधिकरण की नियुक्ति
जहाँ पक्षकार अपनी संविदा की प्रक्रिया के अनुसार मध्यस्थ पर सहमत न हो सकें, वहाँ नियुक्ति हेतु आवेदन धारा 11 के अंतर्गत उच्च न्यायालय को होता है, जो इंदौर के मामलों हेतु मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर है।
अंतरिम उपाय
अंतरिम अनुतोष धारा 9 के अंतर्गत न्यायालय से, मध्यस्थ कार्यवाही से पूर्व, उसके दौरान अथवा अवार्ड के बाद किंतु प्रवर्तन से पूर्व माँगा जा सकता है, तथा अधिकरण के गठित होने पर धारा 17 के अंतर्गत स्वयं अधिकरण से। धारा 17 के अंतर्गत अधिकरण का आदेश न्यायालय के आदेश की भाँति प्रवर्तनीय है।
अवार्ड को चुनौती
अवार्ड केवल धारा 34 के आधारों पर अपास्त किया जा सकता है, जिनमें पक्षकार की निर्योग्यता, करार की अवैधता, उचित सूचना का अभाव, निर्देश के विषय क्षेत्र से बाहर के विषयों पर अवार्ड, अधिकरण का अनुचित गठन, विषय-वस्तु की अमध्यस्थता, तथा भारत की लोक नीति से विरोध सम्मिलित हैं।
आवेदन अवार्ड की प्राप्ति के तीन माह के भीतर किया जाना चाहिए, जो पर्याप्त कारण पर तीस दिन और बढ़ सकता है, उसके बाद नहीं। न्यायालय अवार्ड पर अपील के रूप में नहीं बैठता, और तथ्य की त्रुटि या साक्ष्य पर भिन्न मत स्वयं में आधार नहीं है।
प्रवर्तन
चुनौती की अवधि समाप्त होने पर, अथवा चुनौती अस्वीकृत होने पर, अवार्ड धारा 36 के अंतर्गत न्यायालय की डिक्री की भाँति प्रवर्तित होता है। धारा 34 की चुनौती स्वतः स्थगन नहीं है; इसके लिए अलग आवेदन आवश्यक है और न्यायालय जमा सहित शर्तें लगा सकता है।
मध्यस्थता के बाहर संविदात्मक विवाद
जहाँ मध्यस्थता खंड न हो, वहाँ संविदात्मक विवाद सिविल वाद के रूप में चलता है: धन की वसूली हेतु, भंग की क्षतिपूर्ति हेतु, विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 के अंतर्गत विनिर्दिष्ट पालन हेतु, अथवा घोषणा हेतु।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मध्यस्थ अवार्ड को चुनौती देने की समय-सीमा क्या है?
माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम 1996 की धारा 34(3) के अंतर्गत उस तिथि से तीन माह जब आवेदक ने अवार्ड प्राप्त किया। न्यायालय पर्याप्त कारण से समाधान होने पर तीस दिन और के भीतर आवेदन पर विचार कर सकता है, उसके बाद नहीं।
क्या न्यायालय गुण-दोष पर मध्यस्थ अवार्ड में हस्तक्षेप कर सकता है?
नहीं। धारा 34 गुण-दोष पर पुनर्विलोकन की अनुमति नहीं देती। न्यायालय साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन नहीं करता और अधिकरण के मत के स्थान पर अपना मत नहीं रखता। हस्तक्षेप निर्दिष्ट आधारों तक सीमित है।
मध्यस्थता खंड होते हुए भी वाद प्रस्तुत हो जाए तो क्या होगा?
दूसरा पक्षकार विवाद के सार पर अपना पहला कथन प्रस्तुत करने से पूर्व धारा 8 के अंतर्गत आवेदन कर सकता है, और न्यायिक प्राधिकारी को तब पक्षकारों को मध्यस्थता हेतु निर्दिष्ट करना होगा। यदि वह आवेदन समय पर न किया जाए तो मध्यस्थता पर आग्रह का अधिकार समाप्त हो सकता है।
क्या मध्यस्थता आरंभ होने से पहले अंतरिम अनुतोष मिल सकता है?
हाँ। धारा 9 पक्षकार को मध्यस्थ कार्यवाही आरंभ होने से पूर्व, उसके दौरान, अथवा अवार्ड के बाद किंतु प्रवर्तन से पूर्व न्यायालय से अंतरिम उपाय हेतु आवेदन की अनुमति देती है। जहाँ धारा 9 का आदेश मध्यस्थता आरंभ होने से पूर्व हो, वहाँ कार्यवाही सामान्यतः उस आदेश के नब्बे दिन के भीतर आरंभ होनी चाहिए।
क्या मध्यस्थता सिविल वाद से तेज़ है?
हो सकती है, क्योंकि अधिनियम अभिवचन पूर्ण करने और अवार्ड हेतु समय-सीमाएँ निर्धारित करता है। व्यवहार में यह पक्षकारों के आचरण पर और इस पर निर्भर करता है कि उसके इर्द-गिर्द नियुक्ति, अंतरिम अनुतोष, चुनौती और प्रवर्तन हेतु कितने न्यायालयीन आवेदन उत्पन्न होते हैं।
संदर्भित अधिनियम
- माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम 1996, धारा 8, 9, 11, 17, 34 एवं 37
- भारतीय संविदा अधिनियम 1872
- विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- मध्यस्थ अवार्ड को चुनौती देने की समय-सीमा क्या है?
- माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम 1996 की धारा 34(3) के अंतर्गत उस तिथि से तीन माह जब आवेदक ने अवार्ड प्राप्त किया। न्यायालय पर्याप्त कारण से समाधान होने पर तीस दिन और के भीतर आवेदन पर विचार कर सकता है, उसके बाद नहीं।
- क्या न्यायालय गुण-दोष पर मध्यस्थ अवार्ड में हस्तक्षेप कर सकता है?
- नहीं। धारा 34 गुण-दोष पर पुनर्विलोकन की अनुमति नहीं देती। न्यायालय साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन नहीं करता और अधिकरण के मत के स्थान पर अपना मत नहीं रखता। हस्तक्षेप निर्दिष्ट आधारों तक सीमित है।
- मध्यस्थता खंड होते हुए भी वाद प्रस्तुत हो जाए तो क्या होगा?
- दूसरा पक्षकार विवाद के सार पर अपना पहला कथन प्रस्तुत करने से पूर्व धारा 8 के अंतर्गत आवेदन कर सकता है, और न्यायिक प्राधिकारी को तब पक्षकारों को मध्यस्थता हेतु निर्दिष्ट करना होगा। यदि वह आवेदन समय पर न किया जाए तो मध्यस्थता पर आग्रह का अधिकार समाप्त हो सकता है।
- क्या मध्यस्थता आरंभ होने से पहले अंतरिम अनुतोष मिल सकता है?
- हाँ। धारा 9 पक्षकार को मध्यस्थ कार्यवाही आरंभ होने से पूर्व, उसके दौरान, अथवा अवार्ड के बाद किंतु प्रवर्तन से पूर्व न्यायालय से अंतरिम उपाय हेतु आवेदन की अनुमति देती है। जहाँ धारा 9 का आदेश मध्यस्थता आरंभ होने से पूर्व हो, वहाँ कार्यवाही सामान्यतः उस आदेश के नब्बे दिन के भीतर आरंभ होनी चाहिए।
- क्या मध्यस्थता सिविल वाद से तेज़ है?
- हो सकती है, क्योंकि अधिनियम अभिवचन पूर्ण करने और अवार्ड हेतु समय-सीमाएँ निर्धारित करता है। व्यवहार में यह पक्षकारों के आचरण पर और इस पर निर्भर करता है कि उसके इर्द-गिर्द नियुक्ति, अंतरिम अनुतोष, चुनौती और प्रवर्तन हेतु कितने न्यायालयीन आवेदन उत्पन्न होते हैं।
संबंधित कार्यक्षेत्र
अंतिम अद्यतन: 2026-09-26
चैंबर
चैंबर का समय: सोमवार से शनिवार, सुबह 10:30 से रात 8:00 बजे तक. रविवार अवकाश